29.8.16

3 life management for married couple.

ध्यान रखें ये 3, इनसे नहीं बढ़ेगा पति-पत्नी के बीच तनाव


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यदि पति-पत्नी दोनों ही कामकाजी हैं तो पत्नी चाहती है कि उसे भी घर-परिवार में वैसा ही सम्मान मिले जैसे पति को मिलता है, जबकि पति के विचार इस मामले में अलग हो सकते हैं। पति-पत्नी के टकराव के और भी कई कारण हो सकते हैं। अगर आपके साथ भी यही समस्या है कि इन बातों का ध्यान रखें-

1.एक-दूसरे को सम्मान दें


अक्सर देखने में आता है कि पति अपनी पत्नी को उचित सम्मान नहीं देते। बात-बात पर पत्नी के ऊपर गुस्सा करना, अपशब्द कहना या हाथ उठाने से पत्नी के मन में भी पति के प्रति सम्मान कम हो जाता है। ऐसी स्थिति में पति-पत्नी का व्यवहार एक-दूसरे के प्रति नकारात्मक हो जाता है। जिसका परिणाम इन्हें निकट भविष्य में देखने को मिल सकता है। अत: जरूरी है कि पति-पत्नी एक-दूसरे को सम्मान दें।

2. भावनाओं को समझें


पति-पत्नी का रिश्ता प्रेम व विश्वास पर टिका होता है। इसलिए यह जरूरी है कि वे दोनों एक-दूसरे की भावनाओं को न सिर्फ समझे बल्कि उसका सम्मान भी करें। यदि पति किसी कारणवश पत्नी की इच्छाओं की पूर्ति नहीं कर पा रहा हो तो पत्नी पति पर अनावश्यक दबाव न बनाएं।

3. समय निकालें


वर्तमान की भागदौड़ भरी जिंदगी में पति जहां कमाई में व्यस्त रहता है, वहीं पत्नी बच्चों व परिवार को संभालने में। ऐसी स्थिति में कई बार पति-पत्नी एक-दूसरे को पर्याप्त समय नहीं दे पाते। जिसके कारण दोनों में दूरियां बढ़ जाती हैं। इससे बचने के लिए पति-पत्नी सप्ताह में एक दिन स्वयं के लिए निकालें और कहीं घूमने जाएं या एकांत में समय बिताएं। ऐसा होने से निश्चित रूप से पति-पत्नी के रिश्तों में सकारात्मक परिणाम देखने को मिलेंगे।

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शिव-पार्वती से समझें गृहस्थी की मर्यादा


सफल गृहस्थी का आधार सुखी दाम्पत्य होता है। दाम्पत्य वो सुखी है जिसमें पति-पत्नी एक दूसरे के सम्मान और स्वाभिमान की मर्यादा को ना लांघे। कई बार पतियों का पुरुषत्व वाला अहंकार उन्हें स्त्री के आगे झुकने नहीं देता। बस यहीं से अशांति की शुरुआत होती है दाम्पत्य में।

तुलसीदासजी ने रामचरितमानस में इसके संकेत दिए हैं। तुलसीदासजी ने शिव और पार्वती के दाम्पत्य का एक छोटा सा प्रसंग लिखा है। जिसमें बहुत गहरी बात कही है। प्रसंग है शिव-पार्वती के विवाह के बाद पार्वती ने एक दिन भगवान को शांत भाव से बैठा देख, उनसे रामकथा सुनने की इच्छा जाहिर की। यहां तुलसीदासजी लिखते हैं कि

बैठे सोह कामरिपु कैसे। धरें सरीरु सांतरसु जैसे।।
पारबती भल अवसरु जानी। गई संभु पहि मातु भवानी।।
एक दिन भगवान शिव शांत भाव से बैठे थे। तो पार्वती ने सही अवसर जानकर उनके पास गई। देखिए पत्नी के मन में पति को लेकर कितना आदर है कि उनसे बात करने के लिए भी सही अवसर की प्रतीक्षा की। जबकि आजकल पति-पत्नी में एक-दूसरे के समय और कार्य को लेकर कोई सम्मान का भाव नहीं रह गया। फिर तुलसीदासजी ने लिखा है -
जानि प्रिया आदरु अति कीन्हा। बाम भाग आसनु हर दीन्हा।।
शिव ने पार्वती को अपना प्रिय जानकर उनका बहुत आदर किया। अपने बराबर वाम भाग में आसन बैठने को दिया। पति, पत्नी को आदर दे रहा है। ये भारतीय संस्कृति में ही संभव है। कई लोग आज गृहस्थी को जंजाल भी कहते हैं। लेकिन अगर एक-दूसरे के प्रति इस तरह प्रेम और सम्मान का भाव हो तो गृहस्थी कभी जंजाल नहीं लगेगी।

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इस उपाय से कम होगा पति-पत्नी के बीच तनाव


पति-पत्नी जब एकांत में हो तो परिवार को बीच में ना लाएं। अक्सर विवाहित लोग या तो भविष्य की योजनाओं में या फिर परिवार की समस्याओं में अपने एकांत को अशांति का कारण बना लेते हैं। भगवान श्रीकृष्ण का दाम्पत्य देखिए। कितनी पत्नियां थी और कितना बड़ा परिवार। लेकिन कोई भी उनसे नाखुश नहीं। एक भी पत्नी कृष्ण से नाराज नहीं। एक भी दाम्पत्य में दुराव नहीं था। इसका सबसे बड़ा कारण था भगवान श्रीकृष्ण का सभी को बराबर समय देना।

आठों पत्नियों को पूरा समय देते थे श्रीकृष्ण। उनकी एक खासियत यह भी थी कि वे जिस पत्नी के साथ होते उससे केवल उसकी ही बातें करते थे। कभी किसी दूसरी पत्नी के बारे में कोई बात नहीं छिड़ती थी। इससे उनके बीच कभी तनाव नहीं होता था। हमेशा प्रेम बना रहता था। सिर्फ एक प्रयास से उनका दाम्पत्य सुखी था। अपने जीवन साथी के साथ एकांत और उस एकांत के दौरान बातों में भी किसी तीसरे को प्रवेश ना देना।

लोगों के लिए खासतौर पर महिलाओं के लिए यह थोड़ा मुश्किल होता है लेकिन दोनों पक्षों के प्रयासों से ही यह संभव भी है। कोशिश कीजिए, दोनों जब भी मिलें, सिर्फ खुद की बात करें। खुद के विषयों से भटके नहीं। जैसे ही भटकेंगे, कुछ ना कुछ विवाद खड़ा होगा ही।

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बिना कुछ कहे समझें जीवनसाथी की भावना


निजी जीवन का सबसे महत्वपूर्ण रिश्ता पति-पत्नी का होता है।

रामचरितमानस में राम सीता का दाम्पत्य ऐसा ही था। ना शब्द थे, न कोई बात, बस भावों से ही एक-दूसरे को समझ जाते। वनवास में जब राम, सीता और लक्ष्मण को केवट ने गंगा के पार उतारा तो राम के पास उसे देने के लिए कुछ नहीं था। वे इधर -उधर कुछ देख रहे थे। तभी तुलसीदास ने लिखा है
पिय हिय की सिय जान निहारी, मनि मुदरी मन मुदित उतारी।।
अर्थात सीता ने बिना राम के कहे, सिर्फ उनके हाव-भाव देखकर ही समझ लिया कि वे केवट को कुछ भेंट देने के लिए कोई वस्तु ढूंढ़ रहे हैं और उन्होंने उंगली से अंगुठी उतार कर दे दी। निजी संबंधों में प्रेम ऐसा हो कि शब्दों के बगैर भी बात हो जाए। वो ही रिश्ता सफल भी है और सुखी भी।

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